The Rescue Operation


The Rescue Operation

“When he hesitated, the men grasped his hand and the hands of his wife and of his two daughters and led them safely out of the city, for the LORD was merciful to them.” Genesis 19:16

The Rescue Operation

The Rescue Operation

Genesis chapter nineteen records an account of a rescue operation undertaken by two angels commissioned by God. The outcry of moral depravity had reached the heavenly portals, calling forth an action plan to put a stop to the sinful abasement of the Sodomites. Abraham’s nephew, Lot was by now an established herdsman, recognized by the folks of Sodom.  But somehow he had not mustered the courage enough to move out of that morally putrefying environment. The two angels, appearing as men, are coerced by Lot to spend the night at his place rather than at the city square. But the wicked people of that city surrounded his house and demanded to let the two visitors out. Lot plays mediator and even calls them, ‘friends’, suggesting his acquaintance with the Sodomites. The angels disclose their mission to destroy the city. As dawn gleams across the sky, they urge Lot to escape along with his wife and two daughters. When he hesitated, they grasped his hand and the hand of his wife and two daughters and brought them safely out of the city, for the LORD was merciful to them.

Angels are ministering spirits sent by God to serve God’s children. They warn us against impending danger, instructing and guiding us to safety. Psalm 91:11 says, ‘ For he shall give his angels charge over thee, to keep thee in all thy ways.’ Yes, God is faithful to keep his angels to guard us in all our ways, including the ways of disobedience, rebellion, greed, dishonesty and the like that is taken knowingly or unknowingly. Like Lot we can find ourselves in situations that seem too overwhelming to overcome due to some wrong choice or decision. We may discover how the choices we made out of sheer human instinct have changed our character and perception, rendering us too weak to turn the other way. But we don’t have to stay that way, wallowing in the mud and mire.

This account of the rescue operation of Lot and his family with the underlying factor of God’s mercy, stands out as a sharp reminder of what can become of mere mortals without the intervening mercy of God. Even today, God still reaches out in mercy, sometimes by literally sending angels in disguise to get us out of environments, friendships, associations and peer circles that are harmful to the soul.

Are we willing to make that shift or rather be naive and hesitant like Lot, even in the face of destruction. Lets pay heed to God’s intervening mercy. God can see better far down the line than us.

Prayer – “Heavenly Father, I thank you for Your loving care and protection. Thank you for keeping Your angels in charge over me. May I yield to the changes You bring about in my life and trust Your wisdom which is far greater than mine. Make me resolute in following Your ways.” Amen.

एक स्वरगीय दूत के हाथ में पकड़ी तलवार जो खींची गई थी उसे इसी खलियान में रोका गया था जहाँ मोरियाह पहाड़ की एक नंगी चट्टान पर दाउद ने परमेश्वर के विरुद्ध एक पाप किया था जब उसने जनगणना की थी। तब वहाँ सारे इस्राएल देश में एक महामारी फैल गई थी जिसने पूरे देश पर नाश और निराशा की परत फैला दी थी। तब भविष्यवक्ता गाद की सलाह मान कर दाऊद ने परमेश्वर को मनाने के लिए एक आज्ञा का पालन किया और उसने ओनानि के खलियान को खरीद कर तथा अनाज खरीद कर  परमेश्वर के लिए एक बेदी बनाई थी। और उसने परमेश्वर को होम बलि और अन्न बलि चढ़ाई थी। बाद में इसी स्थान पर जो दाऊद ने दी थी, सुलेमान परमेश्वर के मन्दिर का निर्माण करने वाला था। यदि हम उत्पत्ति के समय में झाँक कर देखें यह जान कर बहुत अदभुत लगता है क्योंकि मोरियाह पर्वत वही स्थान है जहाँ पर दाऊद से 14 पीढ़ी पहले अब्राहम ने अपने बेटे को परमेश्वर की आज्ञा अनुसार लगभग बलि कर दिया था। परन्तु परमेश्वर ने उसकी विश्वास योग्यता को देखते हुए उसे इज़हाक का बलिदान करने से रोक दिया था और बलि के लिए झाड़ियों में फँसा एक मेमना भी दिया था।

बलि चढ़ाना आराधना का एक मुख्य भाग है जो अलग नहीं किया जा सकता है। अब्राहम ने अपने सेवकों से कहा था कि तुम गधों के साथ यहीं रुको जब तक मैं और मेरा बेटा परमेश्वर की आराधना करके आते हैं। जब हम वहाँ जाते हैं तब वहाँ पर आराधना करने के बाद हम लौट कर तुम्हारे पास आते हैं। यह वही स्थान है जहाँ पर अब्राहम ने परमेश्वर को नाम दिया था यहोवा यीरे अर्थात यहोवा सदा पूर्ति करने वाला है क्योंकि परमेश्वर ने उसे अपने बेटे के स्थान पर एक मेमना दिया था जिसे वह बलि चढ़ा सके। और फिर इसी मोरियाह पहाड़ पर यीशु मसीह को क्रूस भी दिया गया था।

जब सुलेमान ने मन्दिर का निर्माण पूरा कर लिया और सारे याजको की रीतियाँ पूरी कर लीं तब बलि के साथ आराधना करने को इस्राएल के आत्मिक जीवन में सही स्थान दिया गया था और तब से ही परमेश्वर के हाथ ने यीशु मसीह के द्वारा उद्धार का कार्यशुरू किया था। हम जो अन्य जाति के थे हमें आराधना करने के सही स्थान पर लाया गया कि हम परमेश्वर पिता के साथ संगति कर सकें। यीशु ने महा पवित्र स्थान में प्रवेश किया जिससे हम परमेश्वर के न्याय के सिंहासन के निकट आ सकें। यीशु मसीह का बलिदान सम्पूर्ण है, सर्वोत्त्म है, और काफी है।

यह जानकारी बहुत ही अदभुत है कि एक खलियान को एक मन्दिर में बदला गया था। हालाँकि दाऊद ने उस स्थान के लिए 50 शेकेल कीमत चुकाई थी पर ओनानि शायद पूरी तरह इस बात से सहमत न हुआ होगा। तौ भी उसने दाऊद को अनुमति दे दी थी कि वह अपनी इच्छा के अनुसार कार्य कर ले जिस से जो बलि वह चढ़ाएगा उसके द्वारा देश को महामारी से छुटकारा मिल सके। वह इस बात को समझ गया था कि दाऊद के लिए इस खलिहान का अधिक महत्त्व था बजाए उसके।

क्या आप जानते हैं कि हमारे जीवनों के विषय में जो महत्त्व परमेश्वर देता है वह हम से कहीं अधिक है। हम इस सत्य को जान कर कैसे जीते हैं? क्या हम ओनानि के समान अपने अधिकार को छोड़ सकते हैं?

प्रार्थना

हे स्वर्गीय पिता, मै अपना जीवन आप को एक जीवित बलिदान के रूप में समर्पित करती हूँ। कृपया पवित्र बनने में मेरी सहायता करें जिससे आप मुझे अपना सकें। सदा आप ही की महिमा हो। यीशु के नाम से माँगती हूँ।   ।।आमीन।।

महत्त्वपूर्ण शब्दकोष

मन्दिर, बलिदान, भेंट

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