Up to the brim


Up to the brim

Jesus said to the servants, “Fill the jars with water”; so they filled them to the brim. ~ John 2:7

The place was full of people. Everybody looked happy as the wedding celebrations went on. The guests knew nothing of what was happening behind the scene. The wine was over. There was no wine to serve the guests. Something had to be done! Amazingly Jesus who was invited for the wedding took control over the situation. Nearby stood six stone water jars, each holding from twenty to thirty gallons. Jesus said to the servants, “Fill the jars with water”; so they filled them to the brim. Then he told them, “Now draw some out and take it to the master of the banquet.” They did so, and the master of the banquet tasted the water that had been turned into wine.

I’m intrigued by the action of the servants. They filled all the six water jars with water right up to the brim. Can you imagine how it must have been to fill six water jars, each holding from twenty to thirty gallons….! It must be time consuming and a trying job. Nevertheless, the servants had complete faith in what God could do over the situation, so they filled the water pots up to the brim. They did not look at the circumstance and limit what God could do. They exercised implicit faith.

Ever wondered what if they had stopped half way, thinking, ‘it’s no good, how can filling up the jars with water help in anyway? What can God do about this?’ What if they decided, ‘Let’s just give up and stop behaving as fools,’ would the water have changed to wine even if the jars were half full?

When sudden unexpected things happen in our lives over which we have no control, how do we react? Are we doubting God’s faithfulness and sovereignty? Do we feel doubtful if things are really going to work, giving up half way? At such times, God expects us to have complete faith in Him. Instead of looking at the circumstances, let’s look to God from whom comes our help. Let’s remember, no situation can limit or hinder God from working, if only we have complete faith.

Prayer

“Dear Jesus, I come to You. I believe You alone are the one who brings change and transformation. I give my whole life to You. Help me trust You completely. Amen.”

Faith is complete trust with no iota of doubt

ऊपर तक

यीशु ने चेलों नौकरों से कहा था,घड़ों को ऊपर तक पानी से भर दो। और उन्होंने वैसा ही किया था। उन्होंने घड़ों को लबो-लब भर दिया था। (यहुन्ना 2 का 7 पद)

वह स्थान लोगों से भरा था। हर कोई विवाह के उत्सव के कारण खुश था। मेहमान कुछ नहीं जानते थे कि पीछे घर के अन्दर क्य़ा हो रहा है जो उन को दिखाई नहीं दे रहा है। घर में दाखरस खत्म हो गया था। लोगों के सामने रखने के लिए दाखरस नहीं बचा था। इस के लिए कुछ करना ज़रूरी था। यह अदभुत बात थी यीशु भी उस विवाह के उत्सव में आमन्त्रित थे। और उसने सारी परिस्थिति को अपने नियन्त्रण में कर लिया था। वहाँ पास में पानी के 6 घड़े रखे थे जो खाली थे जिन में कम से कम 20 से 30 गैलन पानी भरा जा सकता था। सो यीशु ने नौकरों से कहा कि वे उन घड़ों को पानी से ऊपर तक भर दें। सो उन्होंने उनको लबो-लब भर दिया। तब यीशु ने उन से कहा अब उसमें से निकाल कर जिस ने खाने पीने का आयोजन किया है उसके पास ले जाओ। उन्होंने वैसा ही किया। तब खाने पीने का आयोजन करने वाले ने उसे चखा और वह पानी दाखरस बन चुका था।

मैं नौकरों के काम से उलझन में हूँ नौकरों ने उन 6 घड़ों में ऊपर तक पानी भरा था। क्या आप कल्पना कर सकते हैं कि उन को भरने में कितना समय और कितनी मेहनत लगी होगी क्योंकि हर घड़े में 20 से 30 गैलन पानी भरा जा सकता था। फिर भी नौकरों ने ऐसा किया क्योंकि उनको पूरा विश्वास था कि परमेश्वर उस परिस्थिति को बदल सकता है। उन्होंने घड़ों को ऊपर तक भर दिया और थोड़ा सा भी शक नहीं किया था हालाँकि वहाँ की परिस्थिति बहुत ही खराब थी। उन्होंने परिस्थिति की सीमा की ओर न देखा वरण परमेश्वर की उस असीमित सामर्थ पर आँखे गढ़ा कर रखीं थीं जो सब कुछ कर सकता है। उन्होंने अपने उस दृड़ विश्वास का सहारा लिया था।

क्या आप सोच सकते हैं कि यदि उन्हों ने बीच में ही विश्वास करना बन्द कर दिया होता यह सोच कर कि पानी से भरे घड़ों से क्या होगा? पानी कैसे दाखरस बन सकता है? या फिर परमेश्वर इसमें क्या कर सकता है ? तो क्या होता? यदि वे यह सोचते कि हम मूर्खों के समान व्यवहार क्यों करें? तब क्या पानी दाखरस बन सकता था? चाहे वे आधे भी भरे होते?

जब कभी हमारे जीवन में अचानक से कुछ अनहोनी चीज़ें हो जाती हैं जो हमारे नियन्त्रण में नहीं होती हैं तब हमारी प्रतिक्रिया कैसी होती है? तब क्या हम परमेश्वर पर संशय करते हैं? क्या हम परमेश्वर की विश्वासयोग्यता और सामर्थ पर शक कर रहे हैं? क्या हम संशय करने लगते हैं क्या सचमुच सब कुछ ठीक हो जाएगा और आधे रास्ते में ही हार मान लेते हैं ? ऐसे ही समय में परमेश्वर चाहता है कि हम उसपर पूरा विश्वास रखें। ऐसे में अपनी परिस्थितियों पर विश्वास न करते हुए आइए हम परमेश्वर की ओर नज़र लगाएँ क्योंकि हमारी सहायता तो उसी की ओर से आती है।। याद रहे कोई भी परिस्थिति सीमित नहीं है और न ही वह परमेश्वर को अपना कार्य करने से रोक सकती है। केवल पूरे विश्वास और भरोसे की ज़रूरत है।

प्रार्थना

प्रिय यीशु, मैं आप के निकट आती हूँ। मैं विश्वास करती हूँ कि केवल आप ही बदलाव को ला सकते हैं और किसी व्यक्ति को पूरी तरह परिवर्तित कर सकते हैं। मैं अपना समपूर्ण जीवन आप को देती हूँ, कृपया आप पर पूरी तरह विश्वास करने में मेरी सहायता करें। यीशु के नाम से माँग लेती हूँ।   ।।आमीन।।

विश्वास पूरे भरोसे का नाम है जहाँ एक अणु के बराबर भी संशय नहीं होता है

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