Love Each Other


Love won't ends

Love Never ends

My command is this: Love each other as I have loved you. John 15:12

We all need love, without it we cannot do anything. It is this one attribute that runs the whole show. Who can deny or refuse love? More than anything else, we want to be loved, to be approved and appreciated, to be accepted and to be cared for. Knowing its importance, Jesus asks His disciples to love others the way He did. We know that He loves us to the extent that He gave Himself up for us, He gave His life so that you and me might have abundant life. He is love. Therefore, if Christ dwells in us, if we give Jesus Christ a place in our hearts, love dwells in us.

God wants us to be rooted and established in love, loving God, loving others and loving ourselves. He says if we cannot love the person whom we see, how can we love God whom we have not seen at all. We need to love our fellow human being. Love your neighbor as yourself, this was a commandment of God, by obeying this we can experience God’s abundant love in our lives. We can never figure out how a loving word can cause hearts to swell with warmth and gratefulness.

God wants to fill us with His love, right up to the rim in all fullness and help us be the same loving towards others. Love builds up relationships, Love causes people to build others up. Love doesn’t feel the need to push its own importance because it believes in bringing people together and doing good work which goes beyond narrow and selfish confines.

We have a choice each day to build or to break others. We can choose to lay down the path that we want to walk on. Whatever we choose, years later people will remember how we made them feel… whether we made them feel good, bad, ugly or sad inside.

Prayer:

“Dear Jesus, thank You for Your love. Help me to live with Your love that builds others. Teach me to see others the way you see them, Lord, Amen.”


एक दूसरे से प्रेम करो

मेरी आज्ञा यही है, एक दूसरे से वैसा ही प्रेम रखो जैसा मैंने तुम से किया है।” (यहुन्ना 15 का 12 पद)

हम सभी को प्रेम की ज़रूरते है। उसके बिना हम कुछ भी नहीं कर सकते हैं। वह एक ऐसा गुण है जो पूरे शो को चलाता है। कौन कह सकता है कि प्यार नहीं है या उसे प्यार नहीं चाहिए? किसी भी और चीज़ से अधिक हमें प्रेम की ज़रूरत होती है। अपने प्रति समर्थन और प्रशंसा पाने के लिए या फिर दूसरों के देखभाल पाने के लिए। इस के महत्त्व को जानने के लिए ही यीशु ने अपने चेलों से कहा था दूसरों से वैसा ही प्रेम करो जैसा मैं ने तुम से किया है। हम जानते है कि यीशु ने हमें किस हद तक प्रेम किया था वहाँ तक जहाँ उसने अपना जीवन भी हमारे लिए बलिदान कर दिया था जिससे हम अनन्त जीवन पा सकें। प्रभु प्रेम है और यदि हम यीशु को अपने दिल में बसने की जगह देते हैं तो प्रेम हमारे दिल में वास करता है।

परमेश्वर चाहता है कि हम प्रेम में जड़ पकड़ते जाएँ। परमेश्वर से प्रेम करें, दूसरों से प्रेम करें और अपने आप से भी प्रेम करें। परमेश्वर का वचन कहता है कि जब हम उससे प्रेम नहीं कर सकते हैं जिसको हम देख सकते हैं तो उस परमेश्वर से प्रेम कैसे कर सकते हैं जिसको हम देख भी नहीं सकते हैं। हमें अपने साथ जीने वालों से प्रेम रखना है। अपने पड़ोसी से अपने समान प्रेम रख यही परमेश्वर की आज्ञा है। इस आज्ञा का पालन करके हम परमेश्वर के भरपूर प्रेम को पा सकते हैं। हम कभी भी बात को समझ नहीं सकते हैं कि कैसे प्रेम का एक शब्द दिलों के भरपूर कर देता है जिसमें प्रेम की गर्मी और आभार झलकता है।

परमेश्वर हमें अपने प्रेम से भरना चाहता है। ऊपर तक, लबालब, उस भरपूरी के साथ कि हम भी दूसरों पर वह प्रेम लुटा सकें। प्रेम सम्बन्ध बढ़ाता है। प्रेम दूसरों के जीवन को ऊँचा उठाता है। प्रेम कभी अपनी महानता को नहीं गाता न ही अपने प्रेम की बढ़ाई करता है। क्योंकि प्रेम का एक ही उद्देश्य है और वह है एक दूसरे को निकट ले आना। तथा मिल कर कोई अच्छा काम करना जो हर स्वार्थी और संकीर्ण भावना से कहीं ऊँचा है।

हमारे जीवन में हर दिन एक चुनाव सामने रहता है कि हम किसी को प्रेम से बना दें या किसी को तोड़ डालें। सो चुनाव तो हमें ही करना है कि हम किस पथ पर चलेंगे। जो भी हम चुनेंगे उसे सालों बाद भी लोग याद करेंगे  कि हमारे व्यवहार ने उन्हें कैसा अनुभव दिया था। अच्छा, बुरा, कुरूप और अनिष्ट या फिर दुखदायी।

प्रार्थना

प्रिय यीशु, आपके प्रेम के लिए आपका धन्यवाद हो। मुझे भी अपने प्रेम कके सहारे जीवन जीना सिखाएँ जिससे मैं दूसरों के जीवन संवार सकूँ। प्रभु मेरी सहायता करें कि मैं दूसरों को उसी रूप में देख सकूँ जैसा आप उनको देखते हैं। मुझे प्रेम की आशीष दें। यीशु के नाम से माँग लेती हूँ।   ।। आमीन ।।

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