Restitution


“Forgive us our sins as we also forgive those who sin against us” ~ Matthew 6:12

Zacchaeus was to go back the very people whom he had cheated and falsely accused and restore what he had taken. It takes much determination to do that. When people came to John the Baptist asking him what they must do to repent, he answered to the crowd, ‘If you have two cloaks, give one away to him who has nothing’, to the soldiers he said, ‘Be content with your wages. Don’t do violence and charge people falsely’ and to the tax collectors he said, ‘Don’t collect more than what is stipulated’.

Restitution or restoring is an integral part of repentance. It does good for the soul. We are made humble and meek. Our prayers are heard and forgiveness flows. God wants us to dispense grace and forgiveness to others just as mush as we expect Him to do likewise. Matthew 5:23-24 says, ‘When you come to offer your gift at the altar and there remember that your brother has something against you, leave your gift there, first go, get reconciled with him and then come and offer your gift’.

Expressing forgiveness towards others makes forgiveness from God a reality in the experience of repentance. When we make a mistake and turn to God, God will accept our repentance when we have done so to others first. God is not interested in our gift giving. Numerous gifts, prayers, spiritual exercises and sacrifices can be made with no change in the soul. God is more interested in how we reflect His character.

Prayer
“Dear Jesus, I accept Your Lordship in my life. Give me courage to follow you and reflect your likeness. Amen.”

लौटा देना

हमारे अराध क्षमा कर जिस तरह हम अपने अराधियों को क्षमा करते हैं।
(मती 6:12)
ज़कई को उन लोगों के पास दुबारा जा कर वह पैसा लौटाना था जिन से उसने धोखे से पैसा कमाया था। ऐसा करने के लिए बड़ा हौसला चाहिए होता है। जब लोग यहुन्ना बपतिस्मा देने वाले के पास आकर पूछते थे कि उनहे पश्चाताप् करने के लिए क्या करना है तब यहुन्ना उन से कहता था, यदि तुम्हारे पास दो जोड़ी कपड़े हैं तो एक उस दूसरे को दे दो जिसके पास नहीं है। सैनिकों से उसने कहा जो कुछ तुम्हें वेतन मिलता है उससे संतुष्ट रहो। हिन्सा करके लोगो से धोखे से चुंगी मत लो और न ही जितनी चुंगी लेनी है उससे अधिक वसूल करो।
लौटा देना पश्चाताप का एक आवश्यक अंग है। क्यों कि वह आत्मा को शुद्ध करता है। इसके द्वारा हम नम्र बनाए जाते हैं। तब हमारी प्रार्थनाएँ सुनी जाती हैं और क्षमा बह निकलती है। परमेश्वर चाहता है कि हम दूसरों पर अनुग्रह करके उन्हें क्षमा कर दें। ठीक उसी प्रकार जैसे हम उससे क्षमा की आशा रखते हैं। मती के 3 अध्याय के 23 और 24 पद में लिखा है, “जब तुम वेदी पर अपनी भेंट ले कर आते हो और तुम्हें याद आता है कि तुम्हारे भाई के पास तुम्हारे विरुद्ध कुछ है तो अपनी भेंट छोड़ कर पहले अपने भाई से मेल मिलाप कर के आओ फिर अपनी भेंट चढ़ाओ।”
दूसरों को क्षमा करने के द्वारा ही हम परमेश्वर की क्षमा की वास्तविक्ता को प्रकट करते हैं जो पश्चाताप् के द्वारा प्रकट की जाती है। जब हम भूल करते हैं और परमेश्वर की ओर फिर कर पश्चाताप् करते हैं तब वह हमारा पश्चाताप् ग्रहण कर लेता है। पर यह तभी होता है जब हम दूसरों को क्षमा कर देते हैं। परमेश्वर को हमारी भेंटों से कोई दिलचस्पी नहीं है क्योंकि अनगिनत भेंटें प्रार्थनाएँ, आत्मिक रीति रिवाज़ और बलिदान चढ़ाने से कुछ नहीं होगा यदि आत्मा में परिवर्तन नहीं आया है। परमेश्वर को यही पसंद है कि हम किस प्रकार उसके स्वभाव को अपने जीवन से प्रकट करते हैं।
प्रार्थना –
प्रिय यीशु, मैं आप को अपना प्रभु स्वीकार करती हूँ। मुझ में सामर्थ दें कि मैं आप का अनुकरण कर सकूँ तथा आपके स्वभाव को प्रकट कर सकूँ। यीशु के नाम से माँगती हूँ।
।।आमीन।।

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